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समय से पहले सन्नाटा! लघु सिंचाई विभाग हरिद्वार में उड़ रहीं नियमों की धज्जियाँ, अधिकारी नदारद, किसान बेहाल।

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आरिफ नियाज़ी।
​उत्तराखंड सरकार भले ही प्रशासनिक मशीनरी को दुरुस्त करने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों को समय पर दफ्तर आने और जाने के कितने ही कड़े निर्देश क्यों ना दे दे, लेकिन हरिद्वार स्थित लघु सिंचाई विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। इस कार्यालय में सरकार के आदेशों को ताक पर रखकर दफ्तर चलाने का नया ही ढर्रा बना लिया गया है।​​प्रदेश सरकार द्वारा शासकीय कार्यालयों के लिए सुबह 10:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक का समय निर्धारित किया गया है। इसके विपरीत, लघु सिंचाई विभाग हरिद्वार में कर्मचारियों के आने-जाने का कोई निश्चित समय ही नहीं है। आलम यह है कि शाम के 4 बजते ही लगभग पूरा स्टाफ कार्यालय छोड़कर निकल जाता है।सुबह के समय का भी कोई निर्धारित समय नहीं है आलम यह है की दिन ढलने से पहले ही विभाग में सन्नाटा पसर जाता है।
​​जब इस पूरी अव्यवस्था की पड़ताल की गई, तो कार्यालय में मौजूद चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों ने बताया कि “कई लोग तो घर जा चुके हैं और जो बचे हैं, वे लंच कर रहे हैं।” यानी 4:00 बजे जहाँ कर्मचारियों को अपनी मेज पर होना चाहिए, वहाँ कुर्सियाँ धूल फांकती मिलती हैं।
​वहीं लघु सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता का रटा-रटाया जवाब सामने आया।
​पूरे मामले पर जब विभाग के अधिशासी अभियंता भरत राम से बातचीत की गई, तो उन्होंने बताया कि वे इस समय भगवानपुर में साइट के निरीक्षण पर हैं। कर्मचारियों की इस मनमानी पर उन्होंने कहा कि “स्टाफ को बार-बार समय पर कार्यालय आने और पूरा समय देने के निर्देश दिए गए हैं।” हालांकि, ज़मीनी हक़ीक़त यह बयान करती है कि अधिकारियों की चेतावनी का कर्मचारियों पर रत्ती भर भी खौफ नहीं है।​सरकारी ढर्रे और अधिकारियों-कर्मचारियों की इस घोर लापरवाही का सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा क्षेत्र के किसानों को भुगतना पड़ रहा है। अपनी सिंचाई और योजनाओं से जुड़ी समस्याओं को लेकर दूर-दराज के गाँवों से आने वाले किसान दफ्तर पहुँचते हैं, तो उन्हें अक्सर खाली कुर्सियाँ ही मिलती हैं। घंटों इंतजार करने के बाद भी जब कोई जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी नहीं मिलता, तो किसान मायूस होकर खाली हाथ लौटने को मजबूर हो जाते हैं।​शासन के कड़े रुख के बावजूद हरिद्वार लघु सिंचाई विभाग का यह रवैया कई गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि इस अव्यवस्था पर उच्च अधिकारी क्या संज्ञान लेते हैं या किसानों को यूं ही दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे।

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