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19वें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने अजमेर शरीफ की आध्यात्मिक आवाज़ का किया प्रतिनिधित्व।

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आरिफ नियाज़ी।

अजमेर शरीफ की सदियों पुरानी आध्यात्मिक विरासत का प्रभावी प्रतिनिधित्व 19वें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में देखने को मिला, जहाँ दरगाह अजमेर शरीफ के गद्दी नशीन एवं चिश्ती फ़ाउंडेशन के चेयरमैन हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने सहभागिता की। उनकी उपस्थिति ने यह स्पष्ट किया कि सूफ़ी परंपरा की आध्यात्मिक शिक्षाएँ आज भी साहित्य, संस्कृति और आत्मिक खोज से जुड़े वैश्विक संवाद में प्रासंगिक हैं।

फेस्टिवल का उद्घाटन राजस्थान के माननीय मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, तथा माननीय उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी और प्रेम चंद बैरवा की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। यह आयोजन राजस्थान की उस भूमिका को रेखांकित करता है, जो उसे वैश्विक बौद्धिक और सांस्कृतिक संवाद का प्रमुख केंद्र बनाती है। फेस्टिवल का संचालन फ़ेस्टिवल डायरेक्टर्स संजय रॉय, नमिता गोखले और विलियम डेलरिम्पल के नेतृत्व में हुआ, जिसमें देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित लेखक, विचारक और वक्ता शामिल हुए।

हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने “सीकिंग द इन्फिनिट” पुस्तक पर आधारित एक महत्वपूर्ण पैनल चर्चा और संवाद में भाग लिया। यह पुस्तक आधुनिक समय में मनुष्य की अर्थ, शांति, प्रेम और आत्मिक उन्नति की खोज पर केंद्रित है।

इस पैनल में पुस्तक के लेखक याकूब मैथ्यू, सत्र की संचालक लेडी किश्वर देसाई, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका नीलिमा डालमिया, आध्यात्मिक गुरु गुरुदेव श्री अनिश तथा हाजी सैयद सलमान चिश्ती शामिल रहे। सत्र में बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित रहे और संवाद के दौरान गहरी रुचि व सहभागिता देखने को मिली।

सत्र के दौरान हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने कहा:
“सूफ़ी परंपरा में अनंत की खोज का अर्थ दुनिया से भागना नहीं, बल्कि दिल की ओर लौटना है। ईश्वर कहीं बाहर नहीं मिलता, वह तब स्मरण होता है जब अहंकार की जगह प्रेम, विनम्रता और सेवा ले लेती है।”

लेखक याकूब मैथ्यू ने बताया कि सीकिंग द इन्फिनिट आधुनिक जीवन के शोर से परे जाकर आत्मिक शांति और उद्देश्य को पुनः खोजने का आमंत्रण है। वहीं लेडी किश्वर देसाई ने कहा कि साहित्य बौद्धिक चिंतन और जीवंत आध्यात्मिक अनुभव के बीच सेतु का काम करता है। नीलिमा डालमिया ने विभिन्न संस्कृतियों में रहस्यवाद की समान भाषा पर प्रकाश डाला, जबकि गुरुदेव श्री अनिश ने मौन और सजगता को गहन आत्मबोध का मार्ग बताया।

हाजी सैयद सलमान चिश्ती की इस सहभागिता ने अजमेर शरीफ के शाश्वत संदेश “सबसे प्रेम, किसी से द्वेष नहीं” को एक बार फिर विश्व पटल पर स्थापित किया। उनकी उपस्थिति ने भारत की उस सभ्यतागत शक्ति को रेखांकित किया, जहाँ आध्यात्मिकता, बहुलता और संवाद वैश्विक विचारधारा को दिशा देते हैं।

यह सत्र फेस्टिवल के प्रमुख और चिंतनशील आयोजनों में से एक रहा, जिसने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक चिंतन और आत्मिक खोज आज भी भारत और विश्व भर के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।

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