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भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा विधानसभा चुनाव में पार्टी को पड़ सकती है भारी।

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आरिफ नियाज़ी।
उत्तराखंड भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के संगठन को मज़बूत करने के लिए निरंतर प्रयासरत है, लेकिन इसके बावजूद मोर्चे के समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की लगातार उपेक्षा किए जाने से पार्टी के भीतर असंतोष गहराता जा रहा है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि वर्षों से संगठन को मजबूत करने में योगदान देने वाले कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया गया है, जिससे कार्यकर्ताओं में नाराज़गी बढ़ रही है।
ख़ास सूत्रों के अनुसार, भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे में ऐसे लोगों को महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं जिनका ना तो समाज में कोई प्रभाव है और ना ही पार्टी संगठन में कोई ठोस योगदान। वहीं, कुछ ऐसे वरिष्ठ और सक्रिय नेताओं को मोर्चे से बाहर रखा गया है जिनकी समाज और संगठन दोनों में मजबूत पकड़ रही है।
भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के एक वरिष्ठ नेता ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि प्रदेश नेतृत्व द्वारा की जा रही यह अनदेखी आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। उनका कहना है कि जिन नेताओं के पास ज़मीनी स्तर पर समर्थक नहीं हैं, उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देना संगठन की मजबूती के लिए घातक है।
खास तौर पर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के गढ़वाल मंडल अध्यक्ष एवं जिला पंचायत सदस्य अनीस अहमद गौड़ तथा इनायत सोशल वेलफेयर ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं पूर्व सदस्य भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य दानिश गौड़ को इस बार संगठन से पूरी तरह दूर रखा जाना कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। जबकि दानिश गौड़ क़ो अल्पसंख्यक दिवस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सम्मानित भी कर चुके हैं और वह पूर्व सी एम भगत सिंह क़ोशयारी के ख़ास नज़दीकी लोगों में शुमार हैं इन नेताओं की उपेक्षा से ना केवल संगठनात्मक संतुलन बिगड़ने की आशंका है, बल्कि अल्पसंख्यक समाज में पार्टी की पकड़ कमजोर होने का खतरा भी बढ़ गया है। वहीं इस बाबत भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष अनीस गौड़ ने कहा की वह सभी पार्टी कार्यकर्ताओं का सम्मान करते है लगातार कार्यकर्ताओं क़ो सही स्थान दिया जा रहा है कार्यकर्ताओं का सम्मान सर्वोपरि है किसी की कोई उपेक्षा नहीं है आरोप गलत हैं।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते पार्टी नेतृत्व ने संगठन के समर्पित नेताओं की नाराज़गी को दूर नहीं किया, तो इसका सीधा असर आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

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