आरिफ़ नियाज़ी
मंगलौर में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की विलादत के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम की 50वीं स्वर्ण जयंती इस वर्ष ऐतिहासिक और यादगार बन गई। इस मौके पर सेमिनार के उपरांत आयोजित भव्य मुशायरे में देश के कोने-कोने से पहुँचे नामचीन शायरों ने अपने कलाम के ज़रिये कर्बला की कुर्बानी, इंसानियत और भाईचारे का पैग़ाम दिया।
इमामबाड़े में आयोजित इस मुशायरे में श्रोताओं की भारी भीड़ उमड़ी। देर रात तक चली महफिल में शायरों ने एक से बढ़कर एक अशआर पेश कर समां बाँधे रखा।
कार्यक्रम के आयोजक, प्रमुख समाजसेवी एवं पूर्व राज्य मंत्री सैयद अली हैदर ज़ैदी ने बाहर से आए सभी शायरों और मेहमानों का गर्मजोशी से स्वागत किया। मुशायरे का सफल संचालन प्रो. नाशिर नक़वी ने किया।
मुशायरे की शुरुआत मुज़फ्फरनगर से आए डॉ. मुकेश दर्पण के कलाम से हुई। उन्होंने जब यह शेर पढ़ा—
“*अली ने इसलिए अब्बास तेरा नाम रखा है,
कटे हाथों से आसमां को थाम रखा है”
तो पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा। इसके बाद उनका यह कलाम सुनकर माहौल और भी भावुक हो गया—
“मैं दिल की सरज़मीं सजाने में लगा हूँ,
मंदिर तेरा हुसैन बनाने में लगा हूँ,
कर्बोबला से जाता है जन्नत को रास्ता,
ये बात हिन्दुओं को बताने में लगा हूँ।”
इस शेर पर श्रोताओं ने खड़े होकर दाद दी।
मुशायरे की निज़ामत करते हुए प्रो. नाशिर नक़वी ने पढ़ा—
“जश्ने फ़तेह-ए-कर्बला हम यूँ मनाएंगे हुसैन,
ख़ुद मुबारकबाद देने आप आएंगे हुसैन।”
इसके बाद किरतास कर्बलाई ने अपने शेर—
“आज भी लिखा है संसार के माथे पर हुसैन,
मिट गए ख़ाक में ये नाम मिटाने वाले”
पर जमकर वाहवाही लूटी।
शायर शबरोज़ कानपुरी ने पढ़ा—
“उसी ने रोक कर रखा है एक क़यामत को,
वो इख़्तियार जो अब्बास पर हुसैन का है।”
मशहूर शायर सुल्तान सुरूर ने अपने कलाम से माहौल को और ऊँचाई दी—
“कौन इस राज़ को समझेगा सिवाए शब्बीर,
एक तबस्सुम में जो बेशीर ने मेहनत की है।”
इसके बाद शायर सैयद मौलाना शुजा ने कहा—
“क़ुरआन-ए-पाक जैसे तफ़सीर के बग़ैर,
दीन-ए-ख़ुदा है वैसे ही शब्बीर के बग़ैर।”
बनारस से आए मशहूर शायर एरम बनारसी ने पढ़ा—
“खंजर या तलवार से डरना नहीं सीखा,
जो बोल दिया उससे मुकरना नहीं सीखा।”
लखनऊ से पहुँचे मौलाना शरर नक़वी ने अपने कलाम से श्रोताओं को तालियाँ बजाने पर मजबूर कर दिया—
“यज़ीदियत को ये एहसास मार डालेगा,
गला भी अपना कटाकर जीत गए हुसैन।”
जौनपुर से आए मौलाना रज़ी बिस्मानी ने कहा—
“नेज़े के सुर्ख़ सुर्ख़ वरक़ पर ब-हरफ़े हक़,
मैं कामयाब हूँ ये लिखा हुसैन ने।”
युवा शायर सैयद यावर अली ज़ैदी के इस शेर पर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा—
“फ़ितरूस हो या राहिब हबीब और दीन-ए-हक़,
किस किस की मुश्किलों में मदद की हुसैन ने।”
मुशायरे के समापन पर सैयद कौसर ज़ैदी ने अपने कलाम के ज़रिये इमाम हुसैन (अ.स.) के जीवन और उनके पैग़ाम पर विस्तार से रोशनी डाली। वहीं मशहूर शायर जुगनू औरंगाबादी ने श्रोताओं की फरमाइश पर एक से बढ़कर एक कलाम पेश किए, जिससे मुशायरा रात भर चलता रहा।
कार्यक्रम में मौलाना ग़ज़नफ़र अब्बास, मौलाना शुजा ज़ैदी, मौलाना शमीम अब्बास, मौलाना ग़ज़नफ़र अब्बास तुसी, शहर क़ाज़ी मौलाना अकरम सहित अनेक धर्मगुरु और गणमान्य लोग मौजूद रहे। इंतज़ामिया कमेटी में काज़िम रज़ा ज़ैदी, शबी हैदर ज़ैदी, रईस हैदर ज़ैदी, यावर ज़ैदी, श्यान ज़ैदी, समीर ज़ैदी, राहील रज़ा ज़ैदी के साथ-साथ कांग्रेस नेता राव आफ़ाक, मोहम्मद हुसैन, कौसर ज़ैदी, अमीर हसन अंसारी सहित कई प्रमुख लोग शामिल रहे।
कार्यक्रम की सफलता पर आयोजक सैयद अली हैदर ज़ैदी ने सभी शायरों, मेहमानों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।





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