आरिफ नियाज़ी
रुड़की मे सिंचाई विभाग की कार्यशाला अंग्रेजों के ज़माने की धरोहर है जब अंग्रेज़ी वैज्ञानिक सर प्रोबे कोटले गंगनहर का निर्माण करा रहे थे उसी दौरान इस कार्यशाला का भी निर्माण कराया गया था। वर्तमान में किन्हीं कारणो से ये उद्योगशाला बदहाल हालत में थी लेकिन अब पुनः नलकूप मंडल के अधीक्षण अभियंता संजय कुशवाहा के प्रयासों से कार्यशाला के कर्मचारियों को कार्य मिलने लगा है।
कुशवाहा के मुताबिक राजकीय उद्योगशाला में पशुलोक बैराज के रस्सों का कार्य हाल ही में हुआ है जिसमें बड़े पैमाने पर रस्सों और सौकिट का कार्य हो चुका है।जिन्हें तैयार कर पशुलोक बैराज पर फिट कर दिया गया है।इसके अलावा अल्मोड़ा जिले के गगास के गेटों का कार्य तेजी से चल रहा है। पूरे हाइड्रोमेकेनिकल उपकरणों का कार्य चल रहा है।
लोहाघाट के कॉलिगेटिक बैराज के गेटों का कार्य चल रहा है। तो वही पिथौरागढ़ में थरकूट झील का काम भी शुरू हो चुका है।सभी कार्य राजकीय उद्योगशाला में ही कराये जाएंगे।ताकि उद्योगशाला के कर्मचारियों को लगातार कार्य मिलता रहे उन्होंने बताया कि उद्योग शाला के कर्मचारी कड़ी मेहनत के साथ कार्य कर रहे हैं। काफी कार्य हो चुके है शेष कार्य प्रगति पर है। संजय कुशवाहा ने बताया कि अभी वो लगातार प्रयास कर रहे हैं कि उद्योगशाला को लगातार कार्य मिलता रहे जिसके चलते उनकी हाल ही में यूजीवीएनएल और चीला पावर हाऊस के अधिकारियो से भी वार्ता हो चुकी है।

इसके अलावा मनेरी भाली पावर योजनाओं पर कार्य भी किया जा चुका है उनकी कोशिश है कि उद्योगशाला को अधिक से अधिक कार्य मिलें। गौरतलब है कि रूडकी उद्योगशाला में रानीखेत झील के लिए गेटों के निर्माण ,कोलिढेक चम्पावत झील के रेडियल गेटों के निर्माण, व्यासी जलविद्युत परियोजना के लिए 4 मी0 व्यास के 400 मी लंबे पेन्स्टॉक के निर्माण का कार्य , थरकोट पिथौरागढ़ के रेडियल गेटों के निर्माण, तथा नलकूपों के कुलाबों के निर्माण आदि का कार्य हो चुका है।
उन्होंने बताया कि गंगा नहर को अस्तित्व में लाने का श्रेय सर कर्नल प्रोबी कॉटले को जाता है, जिन्हें पूरा विश्वास था कि एक 500 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण किया जा सकता है। उनकी इस परियोजना के विरोध में बहुत सी बाधायें और आपत्तियां भी आयीं जिनमें से ज्यादातर वित्तीय थीं, लेकिन कॉटले ने लगातार छह महीने तक किये गये पूरे इलाके का दौरे और सर्वेक्षण के बाद अंतत: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को इस परियोजना को प्रायोजित करने के लिए राजी कर लिया उन्होंने बताया कि गंगनहर की खुदाई का काम अप्रैल 1842 में शुरू हुआ।
नहर निर्माण के लिए आवश्यक उपकरणों के लिए उनके द्वारा इस राजकीय सिचाई कार्यशाला का रुड़की में निर्माण कराया गया कार्यशाला द्वारा आयुद्ध निर्माण से लेकर लोहे के पुलों, बैराजों, जलविद्युत,परियोजनाओं के उपकरणों के निर्माण का कार्य संपूर्ण भारत के लिए किया जाता रहा है। उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के 90% बैराज तथा पॉवर हाउसों उपकरणों का निर्माण सिंचाई कार्यशाल में ही हुआ हैं।
सिंचाई विभाग के नलकूप मंडल रुड़की के अधीक्षण अभियंता ने बताया कि देहरादून जाते समय पीले रंग का जो पुल मोहंड के पास है वह भी सिंचाई कार्यशाला रुड़की के द्वारा सन् 1893 में बनाया गया था जो कि आज तक भी रुड़की कार्यशाला की शान को बढ़ा रहा है, इसके अतिरिक्त कार्यशाला ने धरासू पेन्स्टॉक, भीमगोडा रेगुलेटर गेट्स, ओखला बैराज, हरिद्वार के रेगुलेटर गेट्स, अल्मोड़ा बैराज, बीएचईएल जैसे विश्वविख्यात प्रतिष्ठान की गैस टरबाइनो के निर्माण का कार्य बड़ी सफलतापूर्वक किया है।
जिसमें बीएचएल के द्वारा प्रशंसा पत्र भी दिए गए हैं ,पथरी बैराज, धनोरी रेगुलेटर गेट्स जैसे लगभग 120 परियोजनाओं का निर्माण किया गया है। इस मौके पर अपर सहायक अभियंता डिगाराम सैनी आदि भी उपस्थित रहे ।

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