आरिफ नियाज़ी।
प्रदेश में इन दिनों नगर निकाय चुनाव में भाजपा, कांग्रेस के अलावा अनेक दल व निर्दलीय प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण जिला हरिद्वार जो तीन तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों की कर्मस्थली बना हुआ है यहां पर भी चुनावी संघर्ष दिलचस्प नजारे पेश कर रहा है। सभी दलों के बड़े नेता अपने प्रत्याशियों के लिए जी जान से जुटे हुए हैं। इसी बीच बसपा को एक प्रमुख चुनावी मुद्दा मिल गया है। भाजपा की इस गफलत का बसपा भरपूर फायदा उठाने का प्रयास कर रही है।
दरअसल इस बार पूरे जनपद में चेयरमैन या मेयर का एक भी पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित नहीं रखा गया है। मेयर के पदों में से जहां रुड़की सामान्य महिला के लिए आरक्षित हैं वहीं हरिद्वार पिछड़ी महिला के लिए आरक्षित है। लकसर नगर पालिका और ढंढेरा नगर पंचायत में अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया गया था लेकिन आपत्ति के बाद दोनों जगह अनुसूचित जाति का आरक्षण समाप्त हो गया। परिणाम स्वरूप पूरे जनपद में कहीं भी अनुसूचित जाति के लिए अध्यक्ष पद आरक्षित नहीं है। इसी आधार पर बसपा दलित वोटों को गोलबंद करने में लगी हुई है लेकिन भाजपा नेतृत्व के रुख से लगता है कि पार्टी इस बार दलित मतदाताओं के बिना ही चुनाव सागर को पार करने का फैसला कर चुकी है । जिसका नतीजा है कि भाजपा के दलित नेता हाथ पर हाथ धरे घर बैठे हैं।उनको कोई जिम्मेदारी तक नहीं दी गई है। तीन बार के सांसद रह चुके हरपाल साथी, तीन बार के विधायक हरिदास, चर्चित दलित नेता और पूर्व विधायक देशराज कर्णवाल जो पार्टी में प्रदेश उपाध्यक्ष भी हैं पूरी तरह चुनावी परिदृश्य से दूर हैं। चुनावी पोस्टरों पर उनके फोटो तक दिखाई नहीं दे रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह के संसद में दिये गये ब्यान के बाद से डाक्टर अम्बेडकर का फोटो भी पार्टी के चुनावी पोस्टरों से पूरी तरह से गायब है। इन सबसे लग रहा है कि भाजपा ने अपनी नीति में अंदरखाने कोई बदलाव किया है। अब इस बदलाव के परिणाम क्या होंगे, यह चुनाव नतीजे बतायेंगे।





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