आरिफ़ नियाज़ी
विश्व प्रसिद्ध हज़रत मखदूम अली अहमद साबिर साहब के सालाना उर्स पर होने वाली नातिया मुशायरे की रस्म पर ना तो उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड की कोई आर्थिक मदद है और ना ही दरगाह प्रशासन को इसमें कोई दिलचस्पी है जिसके चलते अब नातिया मुशायरा एक औपचारिकता बन कर रह गया है। हालांकि नातिया मुशायरे के आयोजक शायर अफ़ज़ल मंगलौरी अब इस ज़िम्मेदारी को बखूबी निभा रहे हैं।
अफ़ज़ल मंगलौरी का कहना है कि उन्हें पिछले पांच साल से ना तो दरगाह प्रबन्धन और ना ही वक्फ बोर्ड से नातिया मुशायरे के लिए कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल सकी है जिसके चलते देश भर से आने वाले शायर नातिया मुशायरे में नहीं पहुंच पाते।मंगलौरी ने बड़ी बेबाकी के साथ कहा कि देश भर से आने वाले शायरों को कार्यक्रम में आने के लिए कुछ नज़राना भी देना होता है लेकिन दरगाह प्रशासन इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।
अफ़ज़ल मंगलौरी ने बताया कि किरत और नातिया मुशायरा भी उर्स शरीफ की बरसों पुरानी रिवायतों का एक हिस्सा है जो दरगाह प्रबन्धन द्वारा चलाया जा रहा था लेकिन पिछले पांच साल से नातिया मुशायरे और कीरत के कार्यक्रम में किसी तरह की कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलने से पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गई है अपने और कुछ दोस्तों के प्रयास से इस रस्म को लगातार जारी रखा है जो आगे भी जारी रहेगी।
गौरतलब है कि शायर अफ़ज़ल मंगलौरी नातिया मुशायरे और किरत के कार्यक्रम को लेकर बेहद संजीदा है उनका कहना है कि दरगाह प्रशासन या वक्फ बोर्ड कोई मदद ना भी करे लेकिन वह इस रस्म को कभी बंद नहीं होने देंगे और हमेशा जारी रखेंगे।

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