आरिफ नियाज़ी
वैसे तो आपने सुना ही होगा की वक्फ संपत्तिया देश के हर कोने कोने में समाई हुई हैं लेकिन इन समाई हुई संपत्तियों का लाभ सरकार और सरकार के नुमाइंदों द्वारा जनता को कितना लाभ मिल पा रहा यह अक्सर देखने वाली बात है।आज हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड हज कमेटी के चेयरमैन मौलाना जाहिद रज़ा रिजवी के उत्तराखंड वक्फ बोर्ड को लिखे गए एक खुले पत्र की जिसमें उन्होंने बहुत कुछ लिखा है।
वक्फ बोर्ड को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है की इस्लाम में वक्फ का तसव्वुर और मुक़द्दस और पाकीज़ा निज़ाम अहद-ए-रिसालत से आज तक चला आ रहा है, जिसका सुबूत कुरअ़ान और हदीस से मिलता है। मुस्लिम कौ़म के सरमायादार और जागीरदारों ने अपनी ज़मीन और जाएदादों को इसलिये वक्फ किया था कि उनकी आमदनी से ग़रीबों, यतीमों, फकीरों, मिस्कीनों, बेवाओं और बेसहारा लोगों की किफालत होती रहे और सदक-ए-जारिया की शक्ल में उसका सवाब उनको और उनके बुज़ुर्गाें को मिलता रहे।
भारत सरकार ने संसद द्वारा वक्फ एक्ट बनाया फिर उसी के तहत हर सूबे में वक्फ बोर्डाें का गठन हुआ और हुकूमतें अपने वरकर्स और नुमाइंदों को वक्फ बोर्ड का चैयरमेन और मिम्बरान बनाती रहीं। दूसरे लफ्ज़ों में इन हज़रात को वक्फ जाएदादों का रक्षक और मुहाफिज़ बनाया जाता है। हिन्दुस्तानी मुसलमानों के पास हर सूबे में हज़ारों करोड़ की वक्फ सम्पत्तियाँ है। अगर वक्फ का पैसा मुसलमानों की तालीम व तरक्क़ी , सेहत और विकास के लिये इस्तेमाल हो जाये तो हुकूमत की मदद की शायद ज़्यादा ज़रूरत न पड़े। मगर बद किस्मती है
‘‘इस घर को आग लग गई घर के चिराग़ से‘‘ इन सम्पत्ति और जाएदादों को लूटने और तबाहो बरबाद करने वाले गै़र नहीं बलकि ज़्यादातर अपने ही हैं। उसकी एक ज़िन्दा मिसाल हरिद्वार ज़िले के पीराने कलियर शरीफ में देखी जा सकती है जिससे बच्चा-बच्चा वाक़िफ है।
जैसा कि मैने बुज़ुर्गाें से सुना है की बादशाह शाहजहाँ ने तकरीबन 1400 बीघा ज़मीन कलियर शरीफ को वक्फ की थी, आज क्या हाल है? वो सब ज़मीन कहां गयी? किन लोगों ने खुर्दबुर्द की?
कितनी साज़िशे हुई? और वक्फ बोर्डाें की मिली भगत से किस तरह वहाँ बन्दरबांट हुई ये बात सूरज से ज़्यादा रोशन है। इसके अलावा भी बहुत से औका़फ एैसे हैं जहां चोरी डकैती और लूटमार आम है। जिसका तफसील से ज़िक्र किया जाय तो बात बहुत तवील हो जाएगी।
आप हज़रात के बोर्ड का जब गठन हुआ तो सूबे के संजीदा गैरजानिबदार, दानिश्वर और बुज़ुर्गाें से अकीदत रखने वाले लोगों को ये पूरी उम्मीद थी कि बहुत अर्से बाद अच्छे लोगों का अच्छा बोर्ड आया है, बहुत से काम होंगे वक्फ सम्पत्तियों की सुरक्षा होगी
खा़स तौर पर कलियर शरीफ का निज़ाम बदलेगा, सफाई तरक्की और खुशहाली का माहौल पैदा होगा, बेईमानी, बदउनवानी और करप्शन का ख़ात्मा होगा। आपके बोर्ड को तकरीबन 10 महीने होने जा रहे हैं, बोर्ड की चार मीटिंग भी हो चुकी है लेकिन अफसोस सख़्त अफसोस के किसी एक तामीरी और फिक्री काम पर न कोई गौर हुआ और न ही अमली तौर पर कोई काम सामने आया। सिर्फ आपसी इख़्तेलाफात और बहसो मुबाहिसे पर मीटिंग्ज़ खत्म हुई, ‘‘ कहां गए थे कहीं नहीं क्या लाए कुछ नहीं‘‘।
बहुत सी कमेटियों की फाइलें पुर्नगठन के लिये, बहुत सी कमेटियाँ रिन्यूवल के लिये जिनकी मुद्दतें डेढ़ साल दो साल पहले खत्म हो चुकी हैं आपके वक्फ बोर्ड में पडी़ हैं। आजतक किसी भी मीटिंग में उनपर कार्यवाही तो दूर की बात गा़ैर भी नहीं किया गया। बहुत से मक़ामात पर कमेटी न होने के कारण लूटमार जारी है और कहीं तो फितना और फसाद बरपा है। इन्तज़ामिया ये कहकर हाथ झाड़ लेता है कि वक्फ बोर्ड से ऑथराइज़ जो कमेटी होगी हम उसी की मदद कर पाऐंगे। आपकी इस बेफिक्री और लापरवाही की वजह से औक़ाफ की जाएदादें तो तबाह व बर्बाद हो ही रही हैं लेकिन बदअमनी अशान्ति और फसाद बरपा होने के भी पूरे पूरे आसार है। साथ ही गुज़िश्ता डेढ़ माह से उत्तराखण्ड सरकार की तरफ से एक हज़ार मज़ारात को मुनहदिम (शहीद) करने का मामला भी तूल पकडे हुए है। शायद उनमे से कुछ मज़ारात यह कहकर शहीद भी कर दिये गये हैं कि ये अवैध तौर नुज़ूल की या फॉरेस्ट की भूमि पर बने हुए हैं।
हुकूमत के इस अमल से भी खुशअकीदा मुसलमानों मंे बेहद ग़म और ग़ुस्सा पाया जा रहा है। इस सिलसिले में भी मुल्क और विशेष तौर पर उत्तराखण्ड के मुसलमान उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड की जानिब बहुत उम्मीद लगाये हुए हैं। इसलिये कि इन मज़ारात में इक्सर वो हैं कि जिनका इंदराज उत्तराखण्ड उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड में है। इस सूरत में उनके तहफ्फुज़ (सुरक्षा) की ज़िम्मेदारी उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड पर ज़्यादा आइद होती है।
यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मज़ार कोई अवैध या फर्जी़ नहीं होता अगर वो किसी अल्लाह के वली का मज़ार नहीं भी है तो किसी मोमिन (मुसलमान) की कब्र होगी और किसी क़ब्र को भी बेवजह शहीद करने की इजाज़त इस्लाम या भारत का संविधान नहीं देता। मेहरबानी करके इस अहम मसअले पर भी ख़ास तवज्जो देने की ज़रूरत है।
मौलाना जाहिद रज़ा रिजवी ने कहा की मैं किसी अदना वक्फ कमेटी का मुतवल्ली, सदर, सिक्रेट्री नहीं हूं और ना बनना चाहता हँू लेकिन मेरी आपसे बसद अदब एक गुज़ारिश है कि खुदा के वास्ते अपने इख़्तेलाफात को बाला-ए-ताक रखकर वक्फ जाएदादों की हिफाज़त और उनको तबाह व बर्बाद होने से बचाने के लिये कुछ मुनासिब फैसले लें ताकि आप हज़रात से प्रदेश की जनता को जो उम्मीदें थी वो पूरी हो सके।




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