आरिफ़ नियाज़ी।
भगवानपुर के खेड़ीशिकोहपुर गांव में मोहर्रम की दस तारीख यानी यौम-ए-आशूरा के आज के दिन अकीदत और गमगीन माहौल के बीच ताजिये निकाले गए। इस दौरान जगह-जगह अखाड़ों का आयोजन हुआ, जिसमें युवाओं ने हैरतअंगेज करतब दिखाए। नोहाखानी करते हुए अकीदतमंद ताजियों के साथ कर्बला के मैदान तक पहुंचे। यहाँ पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.) पर दरूदो-सलाम का नजराना पेश किया गया और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की याद में नम आंखों से नोहाखानी की गई।इस मुकद्दस मौके पर प्रमुख समाजसेवी डॉ. राशिद नियाज़ी ने कर्बला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश करते हुए कहा, “मोहर्रम की दस तारीख इतिहास का वो पन्ना है जब हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने कर्बला के तपते मैदान में हक़, इंसाफ और सच्चाई का परचम बुलंद करते हुए अपने पूरे कुनबे के साथ जान कुर्बान कर दी। उन्होंने भूखे-प्यासे रहकर ज़ुल्म के आगे सिर झुकाने के बजाय शहादत का रास्ता चुना, लेकिन ज़ालिम और अत्याचारी यज़ीद की बैत को कभी स्वीकार नहीं किया।”
डॉ. नियाज़ी ने आगे कहा कि इमाम हुसैन की यह लासानी कुर्बानी केवल किसी एक कौम के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है। उनका जीवन और शहादत हमें यह सिखाती है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों ना हों, ज़ुल्म के खिलाफ हमेशा डटकर खड़े रहना चाहिए। यही वजह है कि आज सदियाँ बीत जाने के बाद भी पूरी दुनिया में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) को बेहद सम्मान और अकीदत के साथ याद किया जा रहा है और यज़ीद का नाम हमेशा के लिए मिट गया है।
इस अवसर पर क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों सहित भारी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे।





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