आरिफ़ नियाज़ी।
भगवानपुर के खेड़ी शिकोहपुर गांव में मोहर्रम के चेहलुम पर हज़रत इमाम हुसैन को याद किया गया।
इस मौक़े पर मजलिस में नोहा खानी के दौरान इमाम हुसैन और करबला की घटना की विस्तार से जानकारी दी गई।इस मौक़े पर डॉ राशिद नियाज़ी ने कहा की करबला की जंग हक़ और बातिल की जंग थी इमाम हुसैन हक़ पर थे इसलिए उन्होंने यज़ीद की बैत को स्वीकार नहीं किया और अपनी जान को कुर्बान कर दिया। इमाम हुसैन ने अपने पूरे खानदान को करबला के मैदान में कुर्बान कर दिया लेकिन यज़ीद की बैत को स्वीकार नहीं किया। करबला की जंग में छः माह के अली असगर को भी शहीद कर दिया गया। उन्होंने कहा की आज पूरी दुनिया में इमाम हुसैन का डंका बज रहा है इमाम हुसैन ने सच्चाई का रास्ता चुना और इस्लाम के लिए करबला में शहीद हो गए। तूर नियाज़ी के नोहे आज भी इमाम हुसैन की याद को ताज़ा करते है। कैसे ना हो गुलाम ज़माना हुसैन का, महबूबे काएनात है नाना हुसैन का, दम तोड़ता है तूर मगर आस तो ना तोड़,मुमकिन है वख्त ए नज़ा पर आना हुसैन का।
तूर नियाज़ी के नोहे आज भी हुसैन के चाहने वालों के दिलों पर राज कर रहे हैं।





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